तुम फिर कब मिलोगी?

हर पल साथ रहे तो भी कम लगे,
हर आस बाट लू फिर भी प्यास रहे,
पर आपको देख कर हम उलझ जाए,
गहरी अनसुलझी बातोँ से हम डर जाए,
और यही पूछने पर मजबूर हो जाये,
कि तुम फिर कब मिलोगी?

हर रास्ता घूम कर रुकु
हर वक्त तुम्हे महसुस करू,
खो जाऊ उसी मुस्कान के रास्तों पे
बीते हर पल में अब यही सोच गुजरती है,
कि तुम फिर कब मिलोगी?

बेचैनियों दिल मे दबाये हुए,हर पल तुम्हें याद करु
यादों के हर लम्हों में बस तेरी ही है आरजू
हवाएँ के गुजरने पर हर पल तुम्हे अनुभव करु,
रूह की हर एक अनुभव बस यही पूछती है,
कि तुम फिर कब मिलोगी?

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